How Dashrath Manjhi Became the Mountain Man | पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाने वाले दशरथ मांझी की कहानी

बिहार के गया ज़िले के गहलौर गांव में जन्मे दशरथ मांझी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि हिम्मत और जुनून अगर सच्चा हो, तो पहाड़ भी झुक जाते हैं। समाज के सबसे निचले वर्ग से आने वाले एक साधारण मजदूर ने सिर्फ अपनी छेनी-हथौड़ी के बल पर ऐसा काम कर दिखाया, जिसे लोग आज भी चमत्कार मानते हैं।

गरीबी, भेदभाव और संघर्ष से भरा जीवन

दशरथ मांझी मुसहर समुदाय से थे—एक ऐसा वर्ग जिसे वर्षों तक सामाजिक भेदभाव झेलना पड़ा। उनके गांव गहलौर और नज़दीकी कस्बे वजीरगंज के बीच एक विशाल पहाड़ था। इस पहाड़ के कारण गाँव वालों को स्कूल, अस्पताल और बाज़ार पहुँचने के लिए करीब 55 किलोमीटर लंबा रास्ता तय करना पड़ता था। कई बार लोग इलाज तक न मिल पाने से जान गंवा देते थे।

एक हादसा जिसने ज़िंदगी बदल दी

साल 1960 में उनकी पत्नी फगुनिया पहाड़ पार करते समय फिसल गईं और गंभीर रूप से घायल हो गईं। अस्पताल पहुंचाने में देर हो गई और उनकी मौत हो गई। यही घटना दशरथ मांझी के दिल में आग बनकर जली। उन्होंने ठान लिया कि अब कोई और उनकी पत्नी की तरह समय पर इलाज न मिलने से नहीं मरेगा।

तीन बकरियां बेचीं, खरीदी छेनी-हथौड़ी

संसाधन लगभग शून्य थे, पर इरादा अटूट। दशरथ मांझी ने अपनी तीन बकरियां बेचकर औज़ार खरीदे और अकेले ही पहाड़ काटना शुरू कर दिया। गांव वाले उन्हें पागल कहते, मज़ाक उड़ाते—लेकिन वह हर सुबह उसी पहाड़ के सामने डट जाते।

22 साल की अथक मेहनत

1960 से शुरू हुई उनकी यह लड़ाई 22 साल तक चली। दिन में खेतों में मजदूरी और रात में पहाड़ काटने का काम—उनकी दिनचर्या यही थी। धीरे-धीरे कुछ लोग उनकी मदद करने लगे, भोजन और औज़ार देने लगे।

पहाड़ के सीने को चीरकर बना दिया रास्ता

1982 में दशरथ मांझी ने असंभव को संभव कर दिखाया। उन्होंने अपने दम पर:

  • 360 फीट लंबा
  • 30 फीट चौड़ा
  • 25 फीट ऊँचा रास्ता तैयार किया।

यह रास्ता गहलौर से वजीरगंज की दूरी 55 KM से घटाकर सिर्फ 15 KM कर देता है। अब बच्चों को स्कूल और मरीजों को अस्पताल पहुंचने में पहले जैसा संघर्ष नहीं करना पड़ता।

सम्मान और विरासत

उनकी उपलब्धि ने पूरे देश को प्रेरित किया। बिहार सरकार ने इस रास्ते का नाम “दशरथ मांझी पथ” रखा। 2006 में उन्हें सम्मानित किया गया, और 2007 में कैंसर के कारण उनका निधन हो गया।

लेकिन उनका संदेश आज भी ज़िंदा है— “अगर ठान लो, तो पहाड़ भी रास्ता दे देता है।”

Leave a Reply