रोहतासगढ़ किले का ऐतिहासिक अतीत अविश्वसनीय रूप से लंबा और गौरवशाली रहा है, जो राजा हरिश्चंद्र से लेकर अफ़गान शासक शेर शाह सूरी के काल तक फैला हुआ है। किले के खंडहरों का भ्रमण करने पर उस युग की सैन्य रणनीति, रक्षा प्रणाली और स्थापत्य कला की स्पष्ट झलक मिलती है। यह दुर्ग इतिहास प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए किसी अनमोल खजाने से कम नहीं है। किले का भ्रमण पर्यटकों को उन अद्भुत ऐतिहासिक कथाओं को गहराई से समझने का अवसर देता है, जो आज भी इसकी टूटी दीवारों और प्राचीरों में अंकित हैं।
कभी सत्ता का केंद्र था, आज उपेक्षा का शिकार
बिहार के रोहतास जिले में कैमूर पहाड़ियों की ऊँचाई पर स्थित रोहतासगढ़ का किला आज भी इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है। भले ही आज यह किला खामोशी और बदहाली में डूबा हो, लेकिन कभी यही दुर्ग सत्ता, शौर्य और सामरिक शक्ति का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था।
त्रेतायुग से जुड़ा है किले का रहस्य
स्थानीय मान्यताओं और जनश्रुतियों के अनुसार रोहतासगढ़ का इतिहास त्रेतायुग तक जाता है। कहा जाता है कि इस किले का निर्माण सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व ने कराया था। किले के मुख्य द्वार के पास लगे शिलापट्ट भी इसी कथा की ओर संकेत करते हैं। यही कारण है कि इसे केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि पौराणिक धरोहर भी माना जाता है।
आदिवासी विरासत और शौर्य का प्रतीक
आदिवासी समुदाय—खरवार, उरांव और चेर—इस किले को अपनी मातृभूमि मानते हैं। उनके लिए रोहतासगढ़ सिर्फ पत्थरों की दीवार नहीं, बल्कि शौर्य और स्वाभिमान का प्रतीक है। विभिन्न कालखंडों में यह किला कई आदिवासी शासकों के अधीन भी रहा।
83 दरवाजों वाला विशाल दुर्ग
लगभग 28 वर्गमील क्षेत्र में फैला यह किला अपनी विशालता के लिए प्रसिद्ध है। इसमें कुल 83 दरवाजे बताए जाते हैं, जो इसकी अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था को दर्शाते हैं। दुर्ग की बनावट और रणनीतिक स्थिति आज भी सैन्य इतिहासकारों को हैरान करती है।

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शशांक देव से लेकर अकबर तक
इतिहास के प्रमाण बताते हैं कि—
- 7वीं शताब्दी में बंगाल के शासक शशांक देव ने यहीं से शासन किया, जिसकी मुहर भी प्राप्त हुई है।
- बाद में यह किला शेरशाह सूरी के अधीन आया।
- अकबर के शासनकाल में राजा मान सिंह ने रोहतासगढ़ को बिहार-बंगाल की प्रांतीय राजधानी बनाकर यहीं से शासन चलाया। उस समय रोहतास सरकार में सात परगने शामिल थे।
शाहजहां का भी रहा ठहराव
इतिहासकारों के अनुसार मुगल सम्राट शाहजहां ने भी अपनी बेगम के साथ कुछ समय इस किले में बिताया था। इससे इस दुर्ग का महत्व और भी बढ़ जाता है। मुगल काल से पहले 1494 ई. में सिकंदर लोदी द्वारा भी इस क्षेत्र के प्रशासन से जुड़े प्रमाण मिलते हैं।
कभी सत्ता का केंद्र, आज बदहाली की तस्वीर
जहाँ कभी हुकूमतें चला करती थीं, आज वही किला उपेक्षा और संरक्षण की कमी से जूझ रहा है।
- किले तक पहुंचने के लिए बेहतर सड़कें नहीं हैं
- पेयजल की भारी समस्या है
- ASI के अधीन होने के बावजूद न पर्याप्त कर्मचारी हैं, न सुरक्षा व्यवस्था
संरक्षण के अभाव में यह ऐतिहासिक धरोहर धीरे-धीरे क्षरण की ओर बढ़ रही है, जिससे पर्यटक भी दूर होते जा रहे हैं।
पर्यटन की उम्मीदें अभी बाकी
स्थानीय जनप्रतिनिधियों के अनुसार रोहतासगढ़ को पर्यटन मानचित्र पर लाने के लिए—
- रोपवे निर्माण
- ऑल-वेदर रोड
- और दीर्घकालीन पर्यटन कार्ययोजना पर काम किया जा रहा है। सरकार से यह मांग भी की गई है कि इस किले को विश्व धरोहर की श्रेणी में शामिल कराने का प्रयास किया जाए।
निष्कर्ष
रोहतासगढ़ का किला सिर्फ ईंट-पत्थरों की संरचना नहीं, बल्कि भारत के गौरवशाली अतीत, पौराणिक कथाओं और सत्ता संघर्षों का जीवंत साक्ष्य है। यदि समय रहते इसका संरक्षण किया जाए, तो यह न केवल इतिहास को सहेज सकता है, बल्कि बिहार के पर्यटन को भी नई पहचान दे सकता है।
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