मध्य प्रदेश का प्राचीन नगर उज्जैन न केवल महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां स्थित काल भैरव नाथ मंदिर भी भारत के सबसे रहस्यमय और विशिष्ट मंदिरों में गिना जाता है। यह मंदिर उज्जैन शहर से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और भगवान शिव के उग्र रूप काल भैरव को समर्पित है। इस मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता है — भगवान को मदिरा (शराब) का भोग चढ़ाने की परंपरा।
देश-दुनिया में शायद ही कोई ऐसा मंदिर हो, जहां भगवान को प्रसाद के रूप में शराब अर्पित की जाती हो और वह प्रसाद भक्तों की आंखों के सामने “स्वीकार” भी होता हुआ दिखाई दे।
काल भैरव कौन हैं?
काल भैरव को भगवान शिव का रक्षक और दंडाधिकारी स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वे समय (काल) के स्वामी हैं और बुराई, अन्याय तथा अधर्म का नाश करते हैं। शैव परंपरा में काल भैरव को नगर रक्षक (कोतवाल) भी कहा जाता है। यही कारण है कि उज्जैन जैसे प्राचीन तीर्थ में काल भैरव का विशेष स्थान है।
यह मान्यता भी प्रचलित है कि महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन से पहले काल भैरव के दर्शन करना आवश्यक माना जाता है, क्योंकि वे पूरे नगर और मंदिर की सुरक्षा करते हैं।
मंदिर का इतिहास: कितनी पुरानी है यह परंपरा?
स्थानीय मान्यताओं और कुछ धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, काल भैरव मंदिर का इतिहास हजारों वर्षों पुराना माना जाता है। कई लोग इसे लगभग 5,000 से 6,000 वर्ष पुराना बताते हैं, हालांकि इतिहासकार इस अवधि को लेकर सतर्क दृष्टिकोण रखते हैं, क्योंकि इसके लिखित और पुरातात्विक प्रमाण सीमित हैं।
फिर भी यह निर्विवाद है कि यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है और मदिरा चढ़ाने की परंपरा भी सदियों से चली आ रही है। यह परंपरा इतनी पुरानी है कि इसका प्रारंभ कब हुआ, इसका स्पष्ट उल्लेख किसी एक ग्रंथ में नहीं मिलता।
मदिरा चढ़ाने की अनोखी परंपरा
काल भैरव मंदिर की सबसे चर्चित और रहस्यमय परंपरा है — भगवान को शराब अर्पित करना।
श्रद्धालु मंदिर परिसर में स्थित दुकानों से मदिरा खरीदते हैं। पुजारी मंत्रोच्चार के साथ उस मदिरा को एक पात्र में भरकर काल भैरव की प्रतिमा के मुख से लगाते हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि कुछ ही क्षणों में पात्र में रखी मदिरा खाली हो जाती है।
यह दृश्य भक्तों के लिए अत्यंत भावनात्मक और आस्था से भर देने वाला होता है। बहुत से लोग इसे भगवान द्वारा भोग स्वीकार करने का प्रमाण मानते हैं।
मदिरा कहां जाती है? वैज्ञानिक जांच और सवाल
इस चमत्कार को लेकर समय-समय पर वैज्ञानिक जांच और तर्क प्रस्तुत किए गए हैं। कुछ वैज्ञानिकों और तर्कवादियों का मानना है कि:
- प्रतिमा के मुख में बने छिद्रों के माध्यम से तरल पदार्थ अंदर चला जाता है
- पत्थर की संरचना में कैपिलरी एक्शन (Capillary Action) के कारण तरल अवशोषित हो सकता है
- तरल पदार्थ नीचे किसी नाली या सोखने वाली सतह में चला जाता है
हालांकि, अब तक कोई भी वैज्ञानिक जांच पूरी तरह यह स्पष्ट नहीं कर पाई कि मदिरा कहां और कैसे जाती है, खासकर इतनी तेज़ी से।
मंदिर प्रशासन भी इस विषय पर कोई तकनीकी दावा नहीं करता। उनका कहना है कि यह आस्था का विषय है, न कि प्रयोगशाला का।
आस्था बनाम तर्क: श्रद्धालुओं की सोच
भक्तों के लिए यह कोई रहस्य नहीं, बल्कि ईश्वर की लीला है। उनका मानना है कि:
- काल भैरव मदिरा स्वीकार करते हैं
- मदिरा उन्हें प्रसन्न करती है
- सच्चे मन से चढ़ाई गई मदिरा से संकट दूर होते हैं
कई श्रद्धालु यह भी कहते हैं कि मन्नत पूरी होने पर वे विशेष ब्रांड की मदिरा अर्पित करते हैं।
वहीं दूसरी ओर, कुछ लोग इसे प्राकृतिक प्रक्रिया मानते हैं और अंधविश्वास से जोड़ने के खिलाफ हैं। लेकिन भारत की सांस्कृतिक परंपरा में आस्था और तर्क दोनों का सह-अस्तित्व हमेशा रहा है।
तांत्रिक परंपरा और काल भैरव
काल भैरव का संबंध तांत्रिक साधना से भी जोड़ा जाता है। तंत्र में मदिरा को पंचमकार (मदिरा, मांस, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन) में से एक माना गया है। इसी कारण कुछ विद्वान मानते हैं कि मदिरा अर्पण की परंपरा का संबंध तांत्रिक पूजा पद्धति से हो सकता है।
हालांकि आज मंदिर में पूजा पूरी तरह सार्वजनिक और नियंत्रित रूप में होती है।
मंदिर की वर्तमान स्थिति और श्रद्धालु
आज काल भैरव मंदिर में देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। खासकर:
- शनिवार
- कालाष्टमी
- भैरव अष्टमी
इन दिनों भारी भीड़ देखने को मिलती है। मंदिर प्रशासन द्वारा सुरक्षा, व्यवस्था और अनुशासन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
यहां मदिरा केवल भोग के रूप में चढ़ाई जाती है, न कि सेवन के लिए।
निष्कर्ष: रहस्य बना रहेगा या नहीं?
काल भैरव मंदिर उज्जैन केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि यह भारत की जीवंत परंपरा, आस्था और रहस्य का प्रतीक है। मदिरा कहां जाती है — इसका उत्तर विज्ञान पूरी तरह नहीं दे पाया, और शायद यही इस मंदिर की विशेषता है।
भारत में आस्था हमेशा तर्क से आगे रही है, और काल भैरव मंदिर इसका सजीव उदाहरण है। यहां न तो किसी पर विश्वास थोपा जाता है और न ही सवाल पूछने से रोका जाता है।
जो श्रद्धा से आता है, उसे आस्था मिलती है।
जो जिज्ञासा से आता है, उसे प्रश्न।
और जो खुले मन से आता है, उसे भारत की सांस्कृतिक गहराई का अनुभव।
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