वैशाली जिले के जंदाहा प्रखंड में स्थित वसंतपुर धधुआ का बाबा बटेश्वरनाथ धाम देश के उन दुर्लभ शिव मंदिरों में शामिल है, जहां वटवृक्ष के कंदरा से स्वयं प्रकट हुआ काला शिवलिंग विराजमान है। यह मंदिर न केवल स्थानीय बल्कि दूर-दराज के श्रद्धालुओं के लिए आस्था और भक्ति का केंद्र माना जाता है। हर साल बड़ी संख्या में लोग यहां मन्नत माँगने और पूजा-अर्चना करने के लिए आते हैं।
बैगन अर्पित करने की अनोखी परंपरा
बाबा बटेश्वरनाथ धाम की सबसे अलग पहचान है यहां की बैगन चढ़ाने की परंपरा। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग पर श्रद्धालु अपने खेतों में उगाई गई पहली बैगन को प्रसाद के रूप में चढ़ाते हैं। यह परंपरा क्षेत्र के किसानों की आस्था और उनके कृषि जीवन से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि श्रद्धा और सच्चाई से मांगी गई मन्नतें यहां अवश्य पूरी होती हैं। मन्नत पूरी होने पर भक्त हर बार बैगन चढ़ाने जरूर आते हैं।
किसान अपने खेतों में मेहनत से उगाई गई बैगन का पहला फल भगवान भोलेनाथ को अर्पित करते हैं। इससे स्थानीय लोगों में कृषि और भक्ति का अनोखा मेल देखने को मिलता है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु मानते हैं कि यह परंपरा उनके जीवन में खुशहाली और समृद्धि लाती है।
मंदिर का प्राचीन इतिहास
मंदिर के उपाध्यक्ष अनिल कुमार सिंह के अनुसार, बाबा बटेश्वरनाथ धाम अत्यंत प्राचीन है और इसकी स्थापना का कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। कहा जाता है कि शिवलिंग स्वयं वटवृक्ष के कंदरा से प्रकट हुआ। मंदिर परिसर में भगवान नंदी महाराज की प्रतिमा भी स्थापित है, जिनकी विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है।
श्रद्धालुओं का मानना है कि यह मंदिर उनकी आत्मिक शांति और मानसिक संतोष का भी केंद्र है। यहां आने वाले भक्त पूजा-अर्चना के दौरान अपने मन की शांति अनुभव करते हैं और जीवन की समस्याओं से मुक्ति पाते हैं। मंदिर का वातावरण पूरी तरह भक्ति और श्रद्धा से परिपूर्ण रहता है।
राजा जनक से जुड़ी ऐतिहासिक मान्यता
स्थानीय मान्यता है कि राजा जनक, जब जनकपुर से चंपा घाट स्नान के लिए जाते थे, तो उनका हाथी बाबा बटेश्वरनाथ धाम में रुकता था। राजा जनक यहां भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करने के बाद ही जनकपुर की ओर प्रस्थान करते थे। यह क्षेत्र कृषि प्रधान होने के कारण, किसानों की उपज में से बैगन को विशेष रूप से भगवान को अर्पित किया जाता है।
मंदिर के आस-पास के गांवों में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। लोग विश्वास करते हैं कि शिवलिंग वटवृक्ष के कंदरा से प्रकट हुआ है, इसलिए यहां की पूजा अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है। मंदिर का यह स्वरूप अन्य मंदिरों से बिल्कुल अलग और अद्वितीय है।
देश-विदेश से भक्तों की आस्था
बाबा बटेश्वरनाथ धाम में पूजा-अर्चना के लिए बिहार के वैशाली, छपरा, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, पटना और आसपास के जिलों से श्रद्धालु आते हैं। इसके अलावा असम के सिलचर, नेपाल और रूस जैसे देशों से भी भक्त यहां आकर आशीर्वाद ले चुके हैं।
मंदिर प्रशासन का दावा है कि पूरे विश्व में यह काले रंग का शिवलिंग और वटवृक्ष के कंदरा से प्रकट होने वाला स्वरूप अद्वितीय है। रूस से आए एक भक्त ने अपनी मुद्रा भी भगवान को अर्पित की थी, जिसे मंदिर संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। यही कारण है कि बाबा बटेश्वरनाथ धाम की ख्याति देश-विदेश तक फैल गई है।
महाशिवरात्रि और बसंत पंचमी का भव्य मेला
मंदिर में महाशिवरात्रि और बसंत पंचमी के अवसर पर भव्य मेला लगता है। महाशिवरात्रि पर पूरे एक महीने तक मेला आयोजित होता है, जिसमें सैकड़ों क्विंटल बैगन भगवान को अर्पित किए जाते हैं। वहीं, बसंत पंचमी पर एक दिन का मेला आयोजित होता है, जिसमें भी बैगन अर्पित किया जाता है। सावन माह में भी श्रद्धालु जलाभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए मंदिर आते हैं।
मेला में स्थानीय व्यापारियों द्वारा तेजपत्ता, लकड़ी और अन्य पूजा सामग्री की बिक्री भी की जाती है। पूरे परिसर में भक्ति और श्रद्धा का माहौल हर आने वाले भक्त को आकर्षित करता है। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसकी अनोखी परंपराएं और ऐतिहासिक मान्यताएं इसे देश-विदेश में प्रसिद्ध बनाती हैं।
श्रद्धालुओं की कहानियां और अनुभव
मंदिर में आए श्रद्धालुओं का अनुभव बताते हैं कि यहां मांगी गई मन्नतें सच में पूरी होती हैं। कई लोगों ने बताया कि कठिन समय में बाबा बटेश्वरनाथ की कृपा से उनके जीवन में बदलाव आया। कुछ भक्तों ने कृषि में उन्नति और परिवार में सुख-शांति के लिए यहां विशेष पूजा की।
भक्तों का कहना है कि यह मंदिर उनकी जीवन यात्रा में आशा और विश्वास का प्रतीक बन चुका है। मंदिर की भव्यता और प्राचीनता के कारण इसे देखने के लिए देश-विदेश से लोग यहां आते हैं। बाबा बटेश्वरनाथ धाम न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि कृषि और जीवनशैली के बीच एक अद्भुत समन्वय स्थापित करता है।
निष्कर्ष
बाबा बटेश्वरनाथ धाम वैशाली जिले का एक अनोखा धार्मिक स्थल है, जहां बैगन अर्पित करने की परंपरा और वटवृक्ष से प्रकट शिवलिंग इसे अद्वितीय बनाते हैं। यहां आकर भक्तों को न केवल भक्ति का अनुभव होता है, बल्कि जीवन में समृद्धि, शांति और आशीर्वाद भी मिलता है। यह मंदिर बिहार की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर का हिस्सा है और आने वाले प्रत्येक भक्त के लिए श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक बन चुका है।
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